हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, सीवान, बिहार/ सीवान शहर, जिला सीवान, राज्य बिहार में एकता सप्ताह के शीर्षक से एक शानदार और गरिमापूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें शिया सुन्नी की महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सामाजिक हस्तियों, उलमा, कवियों, हाफिज़ों, नात पढ़ने वालों तथा बड़ी संख्या में मोमिनों और आम लोगों ने भाग लिया।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों के बीच एकता और एकजुटता, आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देना तथा वर्तमान दौर में उम्मत की एकता के महत्व को उजागर करना था। कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही मोमिनों में काफी उत्साह देखा गया और बड़ी संख्या में लोगों ने इसमें भाग लिया। विशेष रूप से उन लोगों में भी इस कार्यक्रम को लेकर असाधारण रुचि दिखाई दी, जो पहली बार इस तरह के किसी कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
एकता सप्ताह के इस कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि इसमें शिया सुन्नी दोनों विचारधाराओं के उलमा और धार्मिक हस्तियों ने भाग लेकर एकता और एकजुटता का व्यावहारिक प्रदर्शन किया। कवियों ने अपने जोशीले और प्रभावशाली काव्य के माध्यम से एकता, भाईचारे और मुसलमानों की आपसी एकजुटता का संदेश लोगों तक पहुंचाया, जबकि नात पढ़ने वालों ने भी अपनी श्रद्धा और प्रेम का इज़हार किया।
मोमिनों में इस कार्यक्रम को लेकर खासा उत्साह इसलिए भी देखा गया कि सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनेई (र) के एकता के संदेश तथा मुसलमानों की एकता और एकजुटता के संबंध में उनके विचारों और आदेशों को याद किया गया। ईरान की इस्लामी क्रांति के रहबर से प्रेम और श्रद्धा रखने वाले लोगों की इच्छा थी कि सीवान में भी ऐसा कार्यक्रम आयोजित हो, जिसमें उम्मत की एकता, मुसलमानों की एकजुटता और आपसी भाईचारे का संदेश आम किया जाए।
इस तरह के कार्यक्रम जहां भी आयोजित होते हैं, वहां लोगों में जागरूकता, चेतना और एकता की भावना और अधिक मजबूत होती है। सीवान में आयोजित इस कार्यक्रम से भी यही संदेश मिला कि मतभेदों से ऊपर उठकर मुसलमानों को साझा समस्याओं पर एकजुट होने और एक-दूसरे के करीब आने की आवश्यकता है।

अहले सुन्नत के इमाम-ए-जुमा व जमाअत हाफ़िज़ आबिद का संबोधन
कार्यक्रम के दौरान अहले सुन्नत के प्रसिद्ध धर्मगुरु और इमाम-ए-जुमा व जमाअत हाफ़िज़ आबिद ने महत्वपूर्ण और जोशीला संबोधन किया। उनके भाषण में ईरान, फ़िलिस्तीन, मुसलमानों की एकता और इस्लामी क्रांति के रहबर के विचारों एवं सेवाओं का विशेष रूप से उल्लेख किया गया।
हाफ़िज़ आबिद ने फ़िलिस्तीन की मज़लूम जनता के समर्थन पर ज़ोर देते हुए कहा कि दुनिया भर के मुसलमानों को फ़िलिस्तीन में होने वाले अत्याचारों के खिलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए और वहां के हालात व वास्तविक तथ्यों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज़ उठाना और मज़लूम का समर्थन करना मानवीय और इस्लामी ज़िम्मेदारी है।
उन्होंने फ़िलिस्तीन के हालात का उल्लेख करते हुए लोगों से अपील की कि सही तथ्यों को जनता तक पहुंचाने और मज़लूम फ़िलिस्तीनियों की आवाज़ दुनिया तक पहुंचाने की कोशिश की जाए, ताकि दुनिया भर में होने वाले अत्याचारों की सच्चाई लोगों के घरों तक पहुंच सके और झूठ व असत्य के खिलाफ़ सत्य की आवाज़ बुलंद हो।
हाफ़िज़ आबिद साहब ने आगे कहा कि महान धार्मिक और राजनीतिक हस्तियां सदियों में पैदा होती हैं। उन्होंने इस्लामी क्रांति के रहबर हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई की सेवाओं और मुसलमानों की उन्नति के लिए उनके संघर्ष को श्रद्धांजलि दी और कहा कि ऐसी महान हस्ती की सेवाओं को याद रखना और उनके संदेश को आगे बढ़ाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि हमें केवल भावनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि व्यावहारिक मैदान में उतरकर एकता, भाईचारे और मुसलमानों की उन्नति के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। रहबर की दिली इच्छाओं और मुसलमानों की एकता के संदेश को आगे बढ़ाना ही उनकी सेवाओं को श्रद्धांजलि देने का सबसे अच्छा माध्यम है।

अहले सुन्नत के अन्य विद्वानो और हाफ़िज़ों की भागीदारी
कार्यक्रम में मुफ़्ती साहब के अलावा अहले सुन्नत के अन्य उलमा, हाफ़िज़, कवि और नात पढ़ने वालों ने भी भाग लिया और अपने विचार व्यक्त किए।
अहले सुन्नत के कुछ प्रतिभागियों ने इस कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि वे पहली बार इस तरह के कार्यक्रम में शामिल हुए हैं। उनका कहना था कि कार्यक्रम में भाग लेने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि इस प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि अब दिल चाहता है कि भविष्य में जब भी इस विषय पर कोई कार्यक्रम आयोजित हो, तो उसे हरगिज़ न छोड़ा जाए और उसमें पूरी भागीदारी की जाए।
इस अवसर पर अहले सुन्नत के मुफ़्ती साहब, कवियों और नात पढ़ने वालों की मौजूदगी ने कार्यक्रम की रौनक बढ़ा दी। वहीं दूसरी ओर अहले तशय्यु के उलमा और कवियों ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया और कविता तथा गद्य के माध्यम से लोगों तक एकता, भाईचारे और आपसी प्रेम का संदेश पहुंचाया।

शिया विद्वानो और कवियों की भागीदारी
अहले तशय्यु के उलमा और कवियों ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया। उलमा ने अपने भाषणों के माध्यम से उम्मत की एकता, मुसलमानों की एकजुटता, आपसी सम्मान और भाईचारे के संदेश को उजागर किया, जबकि कवियों ने कविता और शायरी के माध्यम से उपस्थित लोगों की भावनाओं को जागृत किया।
कार्यक्रम में कविता और गद्य के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि मुसलमान अपने साझा विश्वासों, साझा समस्याओं और साझा हितों के आधार पर एक-दूसरे के करीब आएं और आपसी मतभेदों को एकता की राह में बाधा न बनने दें।

विशेष अतिथि मौलाना सय्यद इक्तेदार हुसैन रिज़वी का संबोधन
इस अवसर पर कार्यक्रम के विशेष अतिथि मौलाना सय्यद इक्तेदार हुसैन रिज़वी थे, जो भारत से ईरान में धार्मिक शिक्षा के सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए गए हैं। उन्होंने विशेष अतिथि के रूप में कार्यक्रम में भाग लिया और अपने प्रभावशाली संबोधन से उपस्थित लोगों को लाभान्वित किया।
मौलाना सय्यद इक्तेदार हुसैन रिज़वी ने कहा कि ईरान में एकता और भाईचारे के विषय पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में जनता की विशेष रुचि और गहरा जुड़ाव होता है। ऐसे कार्यक्रमों की तैयारियां कई महीने पहले से शुरू कर दी जाती हैं और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों, विद्वतापूर्ण बैठकों तथा साहित्यिक और काव्य कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें सफल बनाया जाता है।
उन्होंने कहा कि ईरान में इस प्रकार के कार्यक्रमों में लोगों के अंदर एक विशेष उत्सुकता, भावनात्मक जुड़ाव और उत्साह पाया जाता है। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ-साथ साहित्यिक और काव्य बैठकों का भी आयोजन किया जाता है। ऐसे कार्यक्रमों में पूरी दुनिया से लोग अतिथि के रूप में भाग लेते हैं और एकता व भाईचारे के संदेश को फैलाने में अपनी भूमिका निभाते हैं।
मौलाना सय्यद इक्तेदार हुसैन रिज़वी ने कहा कि हमें भी भारत में इसी भावना के साथ ऐसे आध्यात्मिक और एकता पर आधारित कार्यक्रम आयोजित करते रहना चाहिए। सप्ताह-ए-वहदत केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि मुसलमानों को एक-दूसरे के करीब लाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
उन्होंने कहा कि हमें अपने मतभेदों को नज़रअंदाज़ करते हुए उन साझा विषयों पर ध्यान देना चाहिए, जो पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा को एकजुट करते हैं। यही रसूले अकरम (स) का आदेश है और यही अहले बैत (अ) की शिक्षा है। हमारे पिछले उलमा हों या वर्तमान उलमा, सभी इस बात पर ज़ोर देते आए हैं कि मुसलमानों के बीच एकता और एकजुटता को मजबूत किया जाए।
उन्होंने आगे कहा कि जब भी एकता के विषय पर कोई कार्यक्रम आयोजित हो, तो हमें अपने विचारों को एकजुट करके ऐसी बातचीत और ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिनसे समाज में एकता, भाईचारे और आपसी प्रेम को बढ़ावा मिले। ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से युवा पीढ़ी को भी एकता और भाईचारे का सही संदेश दिया जा सकता है।
मौलाना सय्यद इक्तेदार हुसैन रिज़वी ने कहा कि यदि नई पीढ़ी के मन में आपसी सम्मान, प्रेम, सहनशीलता और भाईचारे की भावना पैदा की जाए, तो भविष्य में समाज को और अधिक मजबूत और एकजुट बनाया जा सकता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि उम्मत की एकता का संदेश हर जगह पहुंचे, आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा मिले तथा मुसलमानों के बीच एकजुटता का नारा बुलंद हो।
उम्मत की एकता समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता
वक्ताओं ने विशेष रूप से इस बात पर ज़ोर दिया कि आज के दौर में मुसलमानों के बीच एकता और भाईचारा पहले से कहीं अधिक आवश्यक है। दुश्मन तत्व मुसलमानों के बीच मतभेदों को बढ़ावा देकर उन्हें कमजोर करने की कोशिश करते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि मुसलमान अपनी साझा समस्याओं को समझें और एक-दूसरे के साथ मिलकर आगे बढ़ें।
वक्ताओं ने कहा कि यही रसूले अकरम (स) का आदेश है, यही अहले बैत (अ) की शिक्षा है और हमारे बुज़ुर्ग उलमा हमेशा एकता और एकजुटता की शिक्षा देते आए हैं। इसलिए जब भी एकता के विषय पर कोई कार्यक्रम आयोजित हो, हमें अपने विचारों को एकजुट करके ऐसी बातचीत और ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिनसे समाज में एकता, भाईचारे और आपसी प्रेम को बढ़ावा मिले।
कार्यक्रम में शामिल उलमा, कवियों, नात पढ़ने वालों और आम लोगों ने सप्ताह-ए-वहदत के इस कार्यक्रम की बहुत सराहना की और संकल्प व्यक्त किया कि भविष्य में भी इस तरह के कार्यक्रमों के आयोजन में पूरा सहयोग किया जाएगा, ताकि अहले सुन्नत और अहले तशय्यु के बीच एकता, प्रेम, भाईचारे और आपसी सम्मान का माहौल और अधिक मजबूत हो।
सीवान में पहली बार आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम केवल एक धार्मिक सभा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने विभिन्न विचारधाराओं के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने, आपसी संपर्क को मजबूत करने और एकता व भाईचारे के संदेश को आम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इमाम-ए-ज़माना (अ) की दुआ के साथ कार्यक्रम का समापन
अंत में कार्यक्रम के आयोजकों और प्रतिभागियों की ओर से देश और राष्ट्र, मुसलमानों की एकता और उन्नति, फ़िलिस्तीन की मज़लूम जनता तथा पूरी मानवता के लिए भलाई और सलामती की दुआ की गई।
यह गरिमापूर्ण कार्यक्रम इमाम-ए-ज़माना (अ) की दुआ के साथ समाप्त हुआ। सीवान में पहली बार आयोजित सप्ताह-ए-वहदत का यह कार्यक्रम अहले सुन्नत और अहले तशय्यु के बीच एकता, भाईचारे, प्रेम और आपसी सम्मान को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम साबित हुआ।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों ने संकल्प लिया कि उम्मत की एकता के इस संदेश को केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का निरंतर प्रयास किया जाएगा।
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